
Listening skills को सफल व्यक्तियों का एक बड़ा सीक्रेट माना जाता है। भारतीय संस्कृति में भी listening की महत्ता स्पष्ट रूप से दिखाई देती है। भगवान श्रीकृष्ण ने अर्जुन को श्रीमद्भगवद्गीता सुनाई, जिसे अर्जुन ने पूरी एकाग्रता और ध्यान से सुना। लव–कुश ने अयोध्या की जनता को महर्षि वाल्मीकि द्वारा रचित रामायण गाकर सुनाई, और आज भी गुरु–मंत्र कान में सुनाकर ही दिया जाता है। यह सब उदाहरण इस बात का प्रमाण हैं कि ज्ञान, संस्कार और विवेक का वास्तविक संचार ध्यानपूर्वक सुनने से ही होता है।
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Listening सिर्फ़ चुप रहना नहीं है, बल्कि सामने वाले की बात को ध्यान, समझ और खुले मन से ग्रहण करना है। जी हाँ, आपने बिल्कुल सही सुना—listening भी एक skill है। चाहे क्लासरूम हो, जॉब ऑफिस, बिज़नेस मीटिंग, घर का माहौल या फ्रेंड सर्कल—हर जगह जो व्यक्ति ध्यान से सुनता है, वही बेहतर निर्णय ले पाता है और आगे बढ़ता है। अक्सर देखा गया है कि सफल लोग ज़्यादा बोलने के बजाय ज़्यादा सुनते हैं।

दुर्भाग्य से, आज ज़्यादातर लोग सुनने की बजाय बोलने में व्यस्त रहते हैं। बिना बात को ठीक से सुने, बिना समझे ही सामने वाले को जवाब दे देना आम बात हो गई है। ऐसे में बातचीत का मुख्य उद्देश्य भटक जाता है और बातचीत बेवजह की बहस या गलतफ़हमी में बदल जाती है। अंग्रेज़ी भाषा के दो शब्द—Flippant और Ultracrepidarian—ऐसे ही व्यवहार को स्पष्ट रूप से दर्शाते हैं।

Flippant उस व्यक्ति को कहा जाता है जो किसी भी विषय को गंभीरता से नहीं लेता और हर बात का मज़ाक बना देता है।
वहीं Ultracrepidarian वह व्यक्ति होता है जिसे विषय की सही जानकारी नहीं होती, फिर भी वह अपनी राय ज़रूर देता है—सिर्फ़ यह जताने के लिए कि वह भी कुछ जानता है।
इस तरह का रवैया न तो स्वयं व्यक्ति के लिए लाभदायक होता है और न ही सामने वाले के लिए। बल्कि इससे केवल समय, ऊर्जा और संबंधों की बर्बादी होती है। इसके विपरीत, जो व्यक्ति ध्यान से सुनता है, वह न सिर्फ़ बेहतर समझ विकसित करता है बल्कि विश्वास और सम्मान भी अर्जित करता है।
सुनना और ध्यान से सुनना: क्या है अंतर?

व्यवहारिक जीवन में लोग Hear और Listen शब्दों को अक्सर गलत तरीके से प्रयोग करते हैं। Hear का अर्थ है केवल सुन लेना—जहाँ आवाज़ कानों तक पहुँचती है, लेकिन ध्यान कहीं और होता है। जबकि Listen का अर्थ है ध्यानपूर्वक सुनना—जहाँ न सिर्फ़ कान, बल्कि मन और दिमाग भी पूरी तरह बातचीत में शामिल होते हैं। अक्सर लोग फालतू बातों को बहुत ध्यान से सुनते हैं और ज़रूरी बातों को सिर्फ़ सुनकर छोड़ देते हैं। ध्यान से सुनना एक ऐसी क्रिया है जिसमें आपके कान और मन दोनों मिलकर काम करते हैं। यही सुनने और ध्यान से सुनने का मूल अंतर है।
Listening Skills के फायदे
1.बेहतर निर्णय लेने में मदद
जब आप बातचीत को पूरा और ध्यानपूर्वक सुनते हैं, तो अपने अनुभव, वर्तमान परिस्थिति और भविष्य की संभावनाओं को ध्यान में रखकर बेहतर निर्णय ले पाते हैं।
लोगों की भावनाओं और ज़रूरतों को समझ पाना
ध्यान से सुनने पर सामने वाले की मनोदशा और उद्देश्य स्पष्ट हो जाता है।
2.नेतृत्व गुणों का विकास
बात को ध्यान से सुनने वाले व्यक्तियों में ही नेतृत्व के गुण विकसित होते हैं, क्योंकि वे सोच-समझकर निर्णय लेते हैं और उसे व्यवहार में भी उतारते हैं।
Listening Skills का फायदा किन लोगों को मिलता है?
- छात्रों को – Concepts जल्दी clear होते हैं
- नौकरीपेशा और व्यवसायियों को – भरोसा और कार्यक्षमता बढ़ती है
- जनप्रतिनिधियों को – लोगों का विश्वास मज़बूत होता है
- आम व्यक्ति को – पारिवारिक और सामाजिक रिश्ते बेहतर होते हैं
Good Listener की पहचान
- धैर्य और शांत स्वभाव
- सही सवाल पूछने की क्षमता
- सामने वाले को सम्मान देना
Listening Skills और Personality Development
Listening skills और personality development एक-दूसरे के पूरक हैं। इससे आत्मविश्वास बढ़ता है और व्यक्ति का व्यक्तित्व अधिक परिपक्व और प्रभावशाली बनता है।
Listening Skills की कमी से होने वाले नुकसान
- गलतफहमियाँ और टकराव: बात को पूरी तरह न सुनने से गलतफहमियाँ पैदा होती हैं, जिससे रिश्तों में टकराव बढ़ता है।
- उम्मीद से कम रिजल्ट: बात को ठीक से समझे बिना किया गया कार्य अक्सर अपेक्षित रिजल्ट नहीं देता।
- छवि का खराब होना: जो व्यक्ति ध्यान से नहीं सुनता, वह बेवजह की बातचीत और बहस खड़ी करता है, जिससे उसकी छवि खराब होती है।
Flippant और Ultracrepidarian लोगों की पहचान
- बातचीत के बीच में बात काटना
- विषय न समझ आने पर नया टॉपिक छेड़ देना
- बिना सोचे-समझे सबसे पहले अपनी राय देना
Flippant और Ultracrepidarian बनने से कैसे बचें?
- बिना समझे राय न दें :किसी भी विषय पर राय देने से पहले उसे अच्छी तरह समझें।
- मज़ाक और गंभीरता में संतुलन बनाए रखें : बातचीत को सहज बनाने के लिए मज़ाक ठीक है, लेकिन उसकी सीमा समझना ज़रूरी है।
- “पहले सुनो, फिर बोलो” का सिद्धांत अपनाएँ: यह सिद्धांत एक परिपक्व और प्रभावशाली व्यक्तित्व की पहचान है।
निष्कर्ष
सुनना केवल एक कार्य नहीं, बल्कि एक कला है। इसलिए सिर्फ़ सुनिए नहीं, ध्यानपूर्वक सुनिए। क्योंकि सफलता की सीढ़ी बोलने से नहीं, बल्कि ध्यान से सुनने से शुरू होती है।